Friday, October 10, 2008

हमारी आजादी
के साठ वर्ष
बीत गए। उसके
बाद कई
समस्याओं
में एक
नक्सलवाद भी
है। इस
समस्या से
देश के कई
राज्य जुझ
रहे हैं।
नक्सलियों
का सबसे
ज्यादा असर
छत्तीसगढ़
और
आंध्रप्रदेश
में देखने को
मिलता है।
दोनों
राज्यों में
ये आए दिन कोई
न कोई वारदात
करते रहते
हैं।
छत्तीसगढ़
के आदिवासी
बहुल जिलों
में
नक्सलियों
की बढ़ती
गतिविधियों
से निपटने के
लिए प्रदेश
सरकार ने
सलवा जुडूम
अभियान को
प्रोत्साहित
किया। इस
अभियान पर
हमेशा ये
आरोप लगते
रहे कि कमजोर
एवं आदिवासी
लोगों को
नक्सलियों
से मुकाबला
करने के लिए
सरकार
हथियार
उपलब्ध
कराती है। जब
मामला कोर्ट
में पहुंचा
तो कोर्ट ने
कहा कि
'नक्सलियों
से निपटने का
ये मतलब नहीं
कि आप लोगों
को हथियार
बांटेंगे।'
एक
गैर-सरकारी
संगठन की
शिकायतों पर
सुनवाई करते
हुए सुप्रीम
कोर्ट ने
राष्ट्रीय
मानवाधिकार
आयोग को
बस्तर जिले
में
सलवा-जुडूम
अभियान का
नजदीक से
मुआयना कर
रिपोर्ट
देने को कहा।
राष्ट्रीय
मानवाधिकार
आयोग की टीम
ने स्थिति का
मौके पर
मुआयना किया
और अपनी118
पेजों की
रिपोर्ट
जारी की। इस
रिपोर्ट में
नक्सलियों
और सलवा
जुडूम
कार्यकर्ताओं
सहित
सुरक्षा
व्यवस्था की
जिम्मेवारी
संभाल रहे
पुलिसकर्मियों
की भी आलोचना
की है।
रिपोर्ट ने
कहा है कि
नक्सली
आदिवासियों
के रोजमर्रा
की ज़िंदगी
में
अनावश्यक
हस्तक्षेप
करते हैं।
उनके परिवार
के एक सदस्य
को दलम या
संघम में
जबरन शामिल
करते हैं।
रिपोर्ट में
कहा गया है कि
नक्सली
विकास
गतिविधियों
में इसलिए
बाधा डालते
हैं कि
उन्हें लगता
है कि अगर
पिछड़े
इलाके में
सड़क या
बिजली पहुंच
गयी तो वहां
पुलिस भी
पहुंच जाएगी
और उनका खेल
खत्म हो
जाएगा। कोई
भी ठेकेदार
जो वहां काम
करने का ठेका
लेता है
नक्सली बिना
वक्त गंवाए
उसकी हत्या
कर देते हैं।
यही नहीं
आदिवासियों
को भी विकास
कार्यों में
काम करने की
आजादी नहीं
होती।
उन्हें किसी
रोजगार
योजना में भी
रोजी कमाने
की अनुमति
नक्सली नहीं
देते। आयोग
की रिपोर्ट
में
नक्सलियों
की इस बात के
लिए भी
आलोचना की
गयी है कि
आदिवासियों
को
स्वास्थ्य
सुविधाएं,
विद्युतीकरण
और पंचायतों
की योजनाओं
में भी
हिस्सा नहीं
लेने दिया
जाता है। अगर
किसी गांव
में बिजली का
पोल गाड़ा
जाता है तो
नक्सली उसे
नष्ट कर देते
हैं। इतने
सबके बाद
गांव के
नौजवानों को
रोजगार के
लिए शायद ही
कोई मौका
मिलता होगा।
राष्ट्रीय
मानवाधिकार
आयोग की टीम
ने
सलवा-जुडूम
कार्यकर्ताओं
और राज्य
सरकार की भी
जमकर आलोचना
की है। इस टीम
ने एक गांव का
दौरा किया
जहां
सलवा-जुडूम
कार्यकर्ताओं
ने एक
ग्रामीण की
हत्या कर दी
थी। इसके
बावजूद कोई
एफआईआर दर्ज
नहीं की गयी
थी। इस तरह के
कई वाकये हुए
हैं जहां
पुलिस ने आम
लोगों की
रिपोर्ट तक
दर्ज नहीं
की।आयोग ने
सलवा जुडूम
कार्यकर्ताओं
द्वारा
मानवाधिकार
उल्लंघनों
की भी चर्चा
की है। आयोग
ने कहा है कि
आदिवासियों
के घर-बाड़
छोड़ने के
लिए जितने
नक्सली
जिम्मेवार
हैं उतने ही
सलवा-जुडूम
कार्यकर्ता
और उतनी ही
प्रदेश
सरकार की
नीतियां।
गौर करने
वाली बात ये
है कि आखिर
नक्सलियों
की पैठ वहीं
क्यों होती
है जहां
दबे-कुचले और
वंचित रहते
हैं। वे वहां
महानगरों
में पैठ
क्यों नहीं
जमा पाते
जहां वैभव का
साम्राज्य
होता है। वे
समाज के
उन्हीं
तबकों में
अपनी पहुंच
बनाते हैं जो
हमेशा
हाशिये पर
रहे हैं।
वहीं वे रोटी
की भूख के बीच
विचारधारा
की घुट्टी
पिलाते हैं
और तैयार
करते हैं
सशस्त्र
टीम। वे
आदिवासियों
और वंचितों
को ये बताते
हैं कि उनकी
सारी
समस्याओं के
जड़ में शासन
की नीतियां
हैं। वे ये भी
बताने में
सफल होते हैं
कि शासन से
सशस्त्र
संघर्ष के
जरिए की
समाजवाद
लाया जा सकता
है। ये एक ऐसी
हकीकत है
जिसे
समाजशास्त्रियों
से लेकर
नीतियों के
नियंता भी
जानते हैं।
लेकिन हमेशा
ही वे
नक्सलवाद की
समस्या की जड
में जो
सामाजिक-आर्थिक
कारण हैं
उनसे मुंह
मोड़ते हैं।
शासन के
नीति-निर्धारक
हमेशा ही
नक्सलवाद से
निपटने में
गलत रवैया
अपनाते हैं।
वे
सामाजिक-आर्थिक
कारणों को हल
करने की बजाय
नक्सलियों
के बंदुक का
जवाब बंदुक
से ही देना
चाहते हैं।
लेकिन वे ये
नहीं समझते
कि नक्सलवाद
को हिंसा से
खत्म नहीं
किया जा सकता,
उनसे निपटने
के लिए
नक्सलवादियों
के गढ़ में
विकास
कार्यों को
अंजाम देना
होगा,
वंचितों और
आदिवासियों
के बीच
आधुनिक
शिक्षा की
रोशनी जलानी
होगी।
नक्सलियों
से निपटने के
लिए बनाए
जाने वाले
टास्क फोर्स
में पुलिस
बलों और
आर्म्स की
जगह स्कूल,
क़ॉलेज,
अस्पताल
खोलने और
सड़क-बिजली
की स्थिति
सुधारने पर
जोर देना
चाहिए।
पिछड़े
इलाके में
रोजगार के
अवसर पैदा
करने और
केंद्रीय
विकास
योजनाओं को
लागू करने पर
जोर देना
चाहिए। शायद
इन्हीं
तरीकों से
नक्सलियों
को जड़ से
काटा जा सकता
है।